ऑपरेशन दोस्त’ से ‘ऑपरेशन बहिष्कार’: टर्की को सबक सिखाने का समय आ गया है! टर्की का बहिष्कार करें

टर्की का बहिष्कार
आपकी टर्की यात्रा आतंकवाद को बढ़ावा दे रही है? अभी बहिष्कार करें!

वाह, क्या खूब दोस्ती निभाई तुर्की ने! हमने भूकंप में उनकी मदद की, और उन्होंने हमारे पीठ में छुरा घोंपा। अब ‘ऑपरेशन दोस्त’ नहीं, ‘ऑपरेशन बहिष्कार’ का समय है – ताकि उन्हें पता चले, ‘मेहमान नवाजी’ का असली मतलब क्या होता है!

टर्की का बहिष्कार
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क्या हम खामोश रहेंगे?

जब अपमान हमारी पहचान बने

वाह, क्या सीन है! कोई देश हमारे शहीदों का मज़ाक उड़ा रहा है, हमारे जवानों के खून से होली खेल रहा है, और फिर हमारे ज़ख्मों पर नमक छिड़क रहा है। और हम? हम तो महात्मा गांधी के पुतले बने हुए हैं! कब तक हमारे जवान ‘मरते रहें’ (जैसे कि ये कोई मज़ाक हो) और हम चुपचाप उनके यहाँ ‘घूमते रहें’ (जैसे कि हमें कोई और काम नहीं है) जो हमारे जवानों को मारने के लिए हथियार भेजते हैं। क्या यही है हमारी देशभक्ति?

कृतघ्नता की हद

और ये देखिए कृतघ्नता का नमूना! हमने तुर्की को भूकंप के झटकों से बचाया, ऑपरेशन दोस्त चलाया, और बदले में वो हमारे शहीदों का अपमान कर रहे हैं, पाकिस्तान को हथियार दे रहे हैं। तुर्की के राष्ट्रपति तैय्यप एर्दोगान फरमाते हैं कि वे पाकिस्तान के साथ हर हाल में खड़े हैं। क्या बात है! हमारा रुख भी स्पष्ट है – हम उनके एहसान फरामोश रवैये पर चुप रहेंगे और उनके देश में छुट्टियाँ मनाएंगे!

हमारी बेशर्मी कब तक?

हमारा रुख पाकिस्तान की तरफ स्पष्ट है। सवाल यह है कि फिर हम इतने बेशर्म क्यों हैं? हम अपनी मेहनत की कमाई तुर्की में क्यों लगवा रहे हैं? क्या हम अपने ही पैसों से अपने ही जवानों के लिए गोलियां खरीदना चाहते हैं? क्या आप उस देश में घूमने जाना चाहते हैं जिस देश से आए ड्रोन की वजह से हमारे देश की जवानों की विधवाएं रोती हैं? वाह, क्या देशभक्ति है! हम दुश्मन को पाल-पोसकर अपने सैनिकों को मरवाने में लगे हैं!

देशभक्ति या पर्यटन?

क्या हम उस देश की एयरलाइंस में सफर करके किसी और की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करेंगे और फिर वो हमारे सैनिकों को मारने के लिए जो गोला बारूद हथियार आएगा उसमें धन दें? क्या हम वाकई में अपने पैसों से वो गोलियां बनवा रहे हैं जो हमारे वीर जवानों के छाती को चीर रही हैं? देखिए, अगर आप मासूम हैं (और आजकल कौन नहीं है!), तो आपको समझना पड़ेगा कि हर रुपया जो तुर्की जाता है, वह उसी गोली का हिस्सा बनता है जो हमारे जवानों के छाती पर चलती है। इसलिए तुर्की जाना सिर्फ पर्यटन का नहीं, बल्कि देशभक्ति और ज़मीर का सवाल है (और ज़मीर आजकल कहाँ मिलता है?) और आपको अपने अंदर झांककर देखना पड़ेगा (शायद वहाँ आपको अपना खोया हुआ ज़मीर मिल जाए!)। देखना पड़ेगा आपको कि क्या आप तुर्की को देश से ऊपर रखेंगे? (ये भी कोई पूछने वाली बात है! आजकल देश से ऊपर तो अपनी ‘सेल्फी’ होती है!) अगर आप तुर्की को लेकर बड़े नरम हैं तो आज हम आपको तुर्की की असलियत बताते हैं।

कृतघ्नता की पराकाष्ठा और हमारे विकल्प

भूल गए एहसान?

अरे वाह, तुर्की में लोग टूटे-फूटे पड़े थे, और हमने उनकी मदद कर दी! कितनी महानता दिखाई हमने! लेकिन तुर्की ने क्या किया? पाकिस्तान का साथ दे दिया। UN में हमारे खिलाफ बोला, आतंकवादियों के लिए दरवाजे खोले। और तो और, हमारे कश्मीर पर भी बुरी नजर डाल रहा है। और जब हमने थोड़ा सा विरोध किया, तो वो हमारा अपमान कर रहे हैं। क्या खूब दोस्ती निभाई जा रही है!

अपने देश में स्वर्ग

लेकिन हमारे पास क्या है? कश्मीर की वादियाँ हैं, गोवा के समुद्र हैं, राजस्थान के महल हैं, केरल की हरियाली है। मतलब, स्वर्ग यहीं है, और हम कहाँ भटक रहे हैं? और अगर आपको अपने पासपोर्ट पर विदेश का ठप्पा लगवाना ही है, तो ग्रीस चले जाओ, आर्मेनिया चले जाओ, या किसी ऐसे देश में चले जाओ जो कम से कम हमारा साथ तो दे, या चलो, चुपचाप ही खड़ा रहे। हमारे शहीदों का थोड़ा तो सम्मान करो! (वैसे, आजकल सम्मान की किसको पड़ी है?)

असुरक्षित होता पर्यटन

क्या आप वहां छुट्टियां मनाने जाएंगे जहां भारतीयों के पैसे से भारतीयों को मारा जा रहा है? और अब तो तुर्की में भारतीयों को भी पकड़ के मारा जा रहा है, उनके पासपोर्ट छीने जा रहे हैं, और उनसे मोटा पैसा वसूला जा रहा है। पाकिस्तान और तुर्की? वो तो कुछ भी कर सकते हैं! (जैसे कि हमने कभी कुछ नहीं किया!) भारत की नजर में दोनों एक जैसे हैं, और तुर्की की धरती अब भारतीयों के लिए खतरनाक हो गई है। और इसका जिम्मेदार कौन है? हमारे प्यारे एर्दोगान! लेकिन फिर भी, हम तो बेशर्मी से तुर्की जाएंगे ही, क्योंकि हमें अपनी जान की परवाह तो है नहीं, और देशप्रेम तो एक ‘आउटडेटेड’ चीज है।

सुरक्षा का दावा बनाम देशप्रेम

और अगर मान लो तुर्की हमें सुरक्षा देने का दावा भी करे (जैसे कि वो हमारी जान बचाने के लिए बहुत उत्सुक हैं!), तो भी क्या देश से बढ़कर है? अरे, हमने 2023 में तुर्की की कितनी मदद की थी! ऑपरेशन दोस्त चलाया था, अपनी जान जोखिम में डालकर उनकी सेवा की थी। और बदले में हमें क्या मिला?

कृतघ्नता का प्रतिदान

विश्वासघात का हथियार

हमारे जवान, हमारे संसाधन, हमारी दुआएं सब तुर्की गईं। और तुर्की ने हमें क्या दिया? ड्रोन और हथियार, जो हमारे ही खिलाफ इस्तेमाल हो रहे हैं। वाह, क्या खूब सौदा है! और अब तुर्की पर्यटकों की कमी से परेशान है। क्यों? क्योंकि भारत में सबने मिलकर तुर्की का बहिष्कार शुरू कर दिया है। और पैसा? पैसा तो सबसे बड़ी चीज है, है ना? देशभक्ति, सम्मान, ये सब तो बस ‘किताबी बातें’ हैं।

पैसे की ताकत

पैसा जब अस्त-व्यस्त होता है, तो आदमी को न जात दिखाई पड़ती है, न धर्म, न प्रदेश, न देश। सब भूल जाते हैं। और जब भारत के लोगों ने विरोध करना शुरू किया, तो तुर्की की अर्थव्यवस्था डगमगाने लगी। वो जो 2025 में हमसे 7-8 लाख पर्यटकों की उम्मीद कर रहे थे, और 8-12 हजार करोड़ की कमाई की सोच रहे थे, सब पर पानी फिर गया। उनके बाजार से सेब गायब हो गए, होटल खाली पड़े हैं। और अब वो हमसे गिड़गिड़ा रहे हैं – ‘प्लीज वापस आ जाओ’। क्या खूब ड्रामा है!

भारत का स्पष्ट संदेश

लेकिन भारत को यह समझना है कि हम क्यों जाएं? जब तुम कहते हो कि तुम पाकिस्तान के साथ खड़े हो, तो पाकिस्तान को बुलाओ ना, हमें क्यों बुला रहे हो? हालांकि तुर्की को भारतीयों ने एहसास करा दिया है। इस बार हमने जो झटका दिया है, वो सिर्फ आर्थिक नहीं है, बल्कि हमारे आत्मसम्मान की जीत है। और इसीलिए तुर्की परेशान है। हम उन्हें बता रहे हैं कि ‘हम भीख में नहीं, बराबरी में विश्वास रखते हैं’।

बढ़ता बहिष्कार

MakeMyTrip के अनुसार, पिछले एक हफ्ते में तुर्की और अज़रबैजान जाने वाले यात्रियों का कैंसिलेशन 250 गुना बढ़ गया है। बुकिंग्स में 60% की गिरावट आई है। लेकिन फिर भी, कुछ ‘बेशर्म’ (या शायद ‘बहुत देशभक्त’?) अभी भी वहां घूमने जा रहे हैं। वो ये जानते हुए भी जा रहे हैं कि हमारे जवानों के सीने में जो गोलियां दागी जा रही हैं, हमारे देश में जो ड्रोन गिराया जा रहा है, उसमें तुर्की का पैसा लगा हुआ है। क्या यही है असली देशभक्ति?

ऑपरेशन दुश्मन: दोस्ती का प्रतिशोध

विश्वासघात का हथियार

वो जो ड्रोन है ना, वो ‘मेड इन टर्की’ है। और उसके पीछे भी टर्की ही है। पिछले तीन साल में दस लाख से ज़्यादा भारतीय पर्यटक टर्की गए। और हमने उन्हें खूब पैसा दिया। लेकिन उन्होंने हमें क्या दिया? हमारे ही खिलाफ इस्तेमाल होने वाले हथियार। और अब जब उनके पर्यटक कम हो गए हैं, तो उन्हें हमारी याद आ रही है। क्या खूब दोस्ताना व्यवहार है!

दोस्ती का अपमान

जब टर्की भूकंप से जूझ रहा था, तब हम उनके साथ खड़े थे। लेकिन उन्होंने हमें दोस्ती के बदले में क्या दिया? हिंसा, हमारे लोगों की मौत, और मरने के बाद बेशर्मी से पाकिस्तान का साथ देने का ऐलान। तो अब भारत की भी ज़िम्मेदारी बनती है, कि वो टर्की को बताए कि ‘बहुत हो गया’। और भारतीयों की भी ज़िम्मेदारी है कि वो टर्की न जाएँ। हमारे देश में भी बहुत सी खूबसूरत जगहें हैं, जहाँ आप घूम सकते हैं। लेकिन नहीं, हमें तो टर्की ही जाना है, क्योंकि वहाँ जाना ‘स्टेटस सिंबल’ है, है ना?

दुश्मन को आर्थिक मदद?

और जो लोग वहाँ जा रहे हैं, उन्हें ये पता होना चाहिए कि वो पाकिस्तान की सैन्य ताकत को मज़बूत कर रहे हैं। क्योंकि जो पैसा आप टर्की को देते हैं, वही पैसा पाकिस्तान जाता है, और उसी पैसे से हमारे जवानों पर गोलियाँ चलती हैं। ये वही जवान हैं जिनकी वजह से आप चैन की नींद सोते हैं। तो अब आपको तय करना है कि क्या आप देश से गद्दारी करके भी वहाँ जाएँगे? क्योंकि भारत की नज़र में टर्की और पाकिस्तान में कोई फर्क नहीं होना चाहिए। एर्दोगन का वो बयान हमारे लिए एक तमाचा था। हमने बुरे वक्त में उनका साथ दिया, और उन्होंने हमें ये सिला दिया।

आतंक का समर्थक

वो दोनों आतंकी संगठनों को बढ़ावा देते हैं। लेकिन फिर भी, हम वहाँ जाएँगे? नहीं, हमें वहाँ नहीं जाना चाहिए। टर्की को जवाब देने का सबसे अच्छा तरीका है, उनकी अर्थव्यवस्था को तोड़ देना। वो पहले से ही परेशान हैं, उनकी अर्थव्यवस्था डगमगा रही है। और अगर भारतीय पर्यटकों ने पूरी तरह से उनका बहिष्कार कर दिया, तो उनके होटल और बाज़ार खाली हो जाएँगे। पिछले साल हमने टर्की और अज़रबैजान को बहुत सारा पैसा दिया था, लेकिन इस बार वो परेशान हैं, और इसीलिए वो गिड़गिड़ा रहे हैं। लेकिन हमें उनकी गिड़गिड़ाहट में शामिल नहीं होना है। हमें उन्हें ये एहसास दिलाना है कि ये सिर्फ आर्थिक बहिष्कार नहीं है, बल्कि भारत के आत्मसम्मान की लड़ाई है।

देशभक्ति का आह्वान

टर्की को धीरे-धीरे ये एहसास हो रहा है कि भारत से पंगा लेना कितना महंगा पड़ रहा है। लेकिन हमें उन्हें ये एहसास दिलाना है कि #BoycottTurkey सिर्फ एक ट्रेंड नहीं है, बल्कि एक आंदोलन है। एक ऐसा आंदोलन जिसमें हर भारतीय को ये एहसास हो कि वो इस युद्ध का हिस्सा है। ये सिर्फ सेना की लड़ाई नहीं है, बल्कि हर नागरिक को इनके खिलाफ लड़ना है। हमें अब टर्की और टर्की जैसे देशों में पैसा खर्च नहीं करना है, जो पाकिस्तान की खुलकर वकालत करते हैं। हमें उन्हें उनकी औकात दिखानी है। और ये काम हमें चीन के साथ भी करना है। हमें चीन का भी बहिष्कार करना है, और भविष्य में उनके प्रति और भी सख्त रुख अपनाना है। हमें चीन पर अपनी निर्भरता कम करनी है। लेकिन टर्की को भारत का बहिष्कार आसानी से तोड़ सकता है। इसलिए, अगर हर भारतीय एक सिपाही बन जाए, जो हथियारों से नहीं, बल्कि अपने ज़मीर से लड़े, तो टर्की और अज़रबैजान जैसे देश अपनी औकात में आ जाएँगे।

सबक सिखाओ

भारत को अपने पैसे से अपने दुश्मन की ताकत नहीं बढ़ानी चाहिए। हमें टर्की को सबक सिखाना चाहिए। और हम उम्मीद करते हैं कि आप इस अभियान का हिस्सा बनेंगे। आप अपने देश के लिए इतना तो कर ही सकते हैं। और अगर आपको घूमने का शौक है, तो भारत में भी बहुत सी खूबसूरत जगहें हैं। आप वहाँ जा सकते हैं। और अगर आपको विदेश घूमना ही है, तो ग्रीस जैसे देशों में जाएँ, जो खामोश हैं और हमारा समर्थन करते हैं। दुनिया में बहुत से खूबसूरत देश हैं। हमें टर्की जैसे देशों को सबक सिखाना चाहिए, जब तक कि उन्हें ये एहसास न हो जाए कि भारत की दोस्ती को हल्के में नहीं लेना चाहिए। भारत दोस्ती के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, और अगर कोई उसका दुश्मन बनेगा, तो उसे सबक भी सिखा सकता है। और ये सबक सिखाना कोई मुहिम का हिस्सा नहीं है, ये देश की लड़ाई में आपका योगदान है। हम आशा करते हैं कि आप इसमें अपना योगदान ज़रूर देंगे। जय हिंद, जय भारत।

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